dayra

Monday, 2 October 2017

तेरी मर्जी ...!!!

जब न हो साथ तक़दीर
तब एसा ही होता है

कहाँ रहता है साथ पंछियों का
जो चुगा करते है एक चुग्गी चुगा

कभी हवाए तो कभी दिशाए
बदल देती है राहें उनकी
कहते है ज्ञानी होती है होनी

कभी धुप तो कभी छाव
बढ़ा देती है दुरिया उनकी
सुना है होती है कब मन की

कभी बारिश तो कभी तपिश
जूदा कर देती है पनाहें उनकी
देखि है टूटी हुई तस्वीर कल की

कभी सावनी सरसराहट तो कभी पतझड़ी खड़खडाहट
फेर देती है निगाहे उनकी
महसूस की है हलचल जीवन की

कही हुई बातों का अनकहा मतलब
उन लरजते शब्दों का करतब
वो पंछी भी समझते है

जब जब फूल खिलते थे
तब मिलते थे
अब ऋतुये वो ना रही
अनसुनी रह गयी बातें अनकही

कहाँ ले जाऊ तुझे पंछी
हमारा जहां जरा छोटा है
मेरी मुट्ठी में है जो दबा हुआ
वो सिक्का भी खोटा है

जब ना हो साथ तक़दीर
तब एसा ही होता है
मुश्किल में मुस्काता है
और खुशियों में रोता है

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