dayra

Wednesday, 14 March 2012

सृजन : A Path !!!


सत्य तो यह है की मै माफ़ी चाहता हूँ ; क्युकी मुझे अब तक समझ नहीं आ रहा है की क्या ये कोई कविता है !!
पर अब कुछ लिख दिया है तो पोस्ट भी कर दिया ...उम्मीद है ..क्षमावान पाठक क्षमा तो करेगे ही साथ ही आशीष वचन भी कहेगे !! ताकि मुझ अज्ञानी को कुछ अपनी गलतियाँ जानने का मोका भी मिले !!

जब किसी रात मुझे नींद नहीं आती ;
जब कोई बात मुझे भूल नहीं पाती ;
भटकता पहुच जाता हूँ रास्तें अनजान में; 
टूटता कुछ नहीं आवाज आती है पुरे जहाँ में ;
किसी खून के कतरे में उबाल है इतना ;
की सारी दुनिया को जला दे !
किसी आंसू में प्रवाह है इतना ;
की  इस जग को डूबा दे  !


धड़कने बडती है सांसे उखाड़ने लगती है ;
उम्मीदें फिर गुनगुनाने लगती है ;
ले खडग तेयार मन हो जाता है बावला ;
धीर और गंभीर बुद्धि संभालता है मामला;

फिर 
शांत रस में डूब कर जब भाव अपने कहता हूँ में ;
उलझी हुई इस दुनिया में सहज ही बहता हूँ मै;


रात लम्बी कट गयी पर आँखें अब भी तेज है !
इनमे सवेरा देखने का भरा हुआ उत्तेज है !


मन मेरा कहता है देख जो तू चाहता ;
मिलते मोती उसी माझी को ;
सागर के ह्रदय में जो झाकता ;


बेडी गर हो सोने की भी तोड़ दे झकझोर दे !!!
तू विचारों से निराशा का विष अब निचोड़ दे !!!