महसूस करता हु में रात की ठंडी सांसों को,
.........जैसे अब ये कमजोर पड़ने लगी है !
सुनता हूँ मै सन्नाटों मै गूंजती आवाजे ;
अब ये बर्फ सी जमने लगी है !

देखता हु............ मै काले बदल को पिघलते हुएं ;
सारी धुन्धलाहत ओस की बूंदों में उतरने लगी है ;
हल्की सी जय ध्वनी आती है..... मेरे कानों तक ;मेरे कदमो की गति अब बदने लगी है !
जैसे किसी चोटी से मंजिल का नजारा हो ;
...........जैसे स्वर्ग को धरती ने पुकारा हो ;
जैसे उल्लुओ के आगे अँधेरा छाने लगा ;
जैसे भोर की राह में पपीहा गाने लगा ;
हर लम्हे की आहत को हर पदचाप को सुन सकता हु मै ,
उसके मिलने की ख़ुशी में....... हर गम भूल सकता हु मै,
लगता है........ जैसे अब पंछी चाह्चाहयेगे ;
जैसे कोमल लतिकाए अंगड़ाई लेने लगी है !
पर अँधेरा अभी छठा भी नहीं है,रास्ता अभी कटा भी नहीं है !
पूरब से आती हवाए , सूरज का सन्देश लायी है
ठंडी पवन है पर इसने तो मुझने गर्मी जगाई है !
लगता है जैसे सबेरा होने को है........!
सबेरा होने को है....!