सुनसान पगडंडियों पर वो चलता जा रहा था !
आकाश तो है इस समंदर के ऊपर;
होसलों से जंग जीतते है मालूम है उसे ;
पूरब की और से क्या देखता है वो ;
एक बार फिर सूरज उगा आ रहा था !
आशा जगी उठा , कमर कसी फिर ;
पोछा आँखों से नीर, भरे तरकश में तीर ;
निशाना लक्ष्य पर वो साधे जा रहा था !
चलना ही जिंदगी है वो गाए जा रहा था !

आँधियों में भी दिए जलाये जा रहा था !
जीत जायेगे हम गुनगुनाये जा रहा था !
बारिश की बूंदों में भी वो जलता जा रहा था !
मालूम नहीं वो मंजिल कितने दूर है!
आकाश तो है इस समंदर के ऊपर;
पता नहीं जमी किस छोर है !
उम्मीदों का दिया आशाओ से जिया ;
धेर्य का तेल अब घटता जा रहा था !
होसलों से जंग जीतते है मालूम है उसे ;
पर होसला ही होसला खोये जा रहा था !
उड़ने की कला तो आती थी उसे ;
पर स्वप्न लोक में कोहरा छाए जा रहा था !
चलते चलते गिरता फिर उठता वो ;
लड़खड़ाते पैर पर वो चलता जा रहा था! पूरब की और से क्या देखता है वो ;
एक बार फिर सूरज उगा आ रहा था !
आशा जगी उठा , कमर कसी फिर ;
पोछा आँखों से नीर, भरे तरकश में तीर ;
निशाना लक्ष्य पर वो साधे जा रहा था !
चलना ही जिंदगी है वो गाए जा रहा था !

हार को हराने की योजना बनाये जा रहा था !
कर्म की धरती पर मेहनत के बीज बिछाये जा रहा था !
आँधियों में भी दिए जलाये जा रहा था !
जीत जायेगे हम गुनगुनाये जा रहा था !
ये कोई कविता नहीं , ये एक सच्चाई है ! जिसे मैंने जिया है , जैसे उम्हड़ता सा ज्वार सागर के शांत तन पर उत्पात मचाता है ! वैसे ही कोई समय का क्षण मेरे मन को द्रवित कर गया था !.........पर फिर वो कभी नहीं आया !!!!! कभी नहीं ...