ये एक पंछी की कहानी है ,

उसे चाहिए था बसेरा ;
डालना था कही डेरा ...फ्रिर्र्र ...
सोया ना जागा दिन भर वो भागा;
खोया ना पाया कैसा अभागा ;
घर बनाया भी तो जहाज पर ;
ना मालूम था उसे ये रहता नहीं किनारों पर ,
आज रात आराम फ़रमाया ,
स्वप्न लोक में सेर कर आया
जब जागा , होश आया तो ,
अपने को सागर की गोदी में पाया ;
ना मिट्टी थी ना था पेड़ो का साया ;
ऊपर सूरज का तेज, निचे समंदर की काली काया ;
बिना दीवारों के पिंजरे में अपने को पाया
वतन का मतलब अब उसे समझ में आया ;
करना तो थी उसे अब सेर ;
अपना ना था कोई यहाँ थे सब गैर ;
वो बारिश की रातें वो नीम की छाया ;
धान के खेतों से कैसे दाना चुग आया ;
वो कलरव मस्ताना वो चों चो के झगडे ;
यादों के दौर में कुछ दिन है गुजरे ;
अब जहाज लौटने लगा
लौटते हुए जहाज से जमी दिखाई दी ;
ख़ुशी इतनी थी की दुःख में कमी दिखाई दी ;
उड़ने लगा वो तेज ,
स्वदेश की और बड़ने लगा वो
ओ जंगल सभाएं और चकवे की कहानी;
ओ ऊँची उड़ाने ओ झरने का पानी;
अब तो कुछ अलग ही स्वाद था !
उन खट्टे अंगूरों का .....मिल गया था उसको
वही मिट्टी की खुशबू वही पेड़ो का साया ;
वतन का मतलब उसे समझ में आया !
आखिर आ ही गया ना .....हाँ हाँ हाँ
as always so masttttt ... u r awsmmmm
ReplyDeletethank u vandevii
ReplyDeleteits a beautiful poem... loved it
ReplyDeleteआ अब लौट चले ---- बहुत बढिया
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